विŸिाय समावेशन: मुद्दे और चुनौतियां

 

रेनू सरदाना1] मोनिषा चैधरी2

1असिस्टेंट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र), राजकीय महाविद्यालय तिगांव, (फरीदाबाद) हरियाणा

2असिस्टेंट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र), राजकीय महाविद्यालय तिगांव, (फरीदाबाद) हरियाणा

 

 

प्रस्तावना

भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। देश के आर्थिक विकास व कृषि के विस्तार हेतु बैंकिग सुविधाओं का विस्तार होना अति आवश्यक है। वाणिज्य और उधोग एक संगठित व्यवसाय है और इनकी मांग उत्पादक कार्याे के लिए होने के कारण बहुत पहले ही बैंको और औधोगिक विŸा की विशिष्ट संस्थाओ का विकास हुआ है कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है। कृषि एक असंगठित व्यवसाय होने के कारण कृषकों द्धारा लिये जाने वाले ऋणों में स्पष्ट रूप से उत्पादक व अनुत्पादक में भेद कर पाना आसान नही होता। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व कृषको की विŸा संबधी आवश्यकता की पूर्ति गैर-संस्थागत स्त्रोत-महाजन, साहुकार, संबधी रिश्तेदार, व्यापारी, जमींदार आढतिये द्धारा की जा रही थी किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात संस्थागत विŸा स्त्रोतः-(प) सहकारी समितियां और बैंक (पप) व्यापारिक वाणिज्यिक बैंक (पपप) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक का काफी विस्तार हुआ है। वाणिज्यिक बैंको की 60,000 से अधिक शाखाएं, 1,00,000 से अधिक प्राथमिक कृषि साख समितियां, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको की 10,000 से अधिक शाखाए तथा प्राथमिक शहरी सहकारी बैंको की 2000 से अधिक शाखाएं और कई अन्य विŸाीय संस्थाए जनता को ऋण प्रदान कर रही है। परन्तु हम यह कह सकते है कि व्यापक संस्थात्मक विŸाीय आधार, जो देश के दूर दराज इलाको तक फैल चुका है। फिर भी स्वतन्त्रता प्राप्ति के 66 वर्ष पश्चात् आज भी देश का एक बड़ा वर्ग बैकिंग सेवाओं से वंछित है। ग्रामीण क्षेत्रो में यह स्थिति अत्यधिक गम्भीर है। यह समस्या केवल कृषि में लगे लोगों तक ही सीमित नही है असंगठित क्षेत्र की बहुत सी गैर कृषि उत्पादन इकाइयां (जो कृषि व संगठित औधोगिक क्षेत्र में कम रोजगार संबद्धि की भरपाई करती है एंव लोगों को रोजगार उपलब्ध कराती है) जो केवल बाहरी साख समर्थन से पनप सकती है, विŸाीय बहिष्करण का सामना कर रही है। अर्थात उन्हे विŸाीय संस्थाओं से उपयुक्त मात्रा में ऋण नही मिलते।

 

उदेश्य:- विŸाीय समावेशन के अध्ययन हेतु निम्नाकिंत उदेश्यों को निर्धारित किया गया है।

 

ऽ  बैकिंग सेवाओं की उपलब्धता का अध्ययन करना

ऽ  विŸाीय बहिष्करण के कारणों का अध्ययन करना

ऽ  साख उपलब्धता संबधी तथ्यों का अध्ययन करना

ऽ  विŸाीय समावेशन की अवधारणा का अध्ययन करना

 

परिकल्पना:-

प्रस्तुत शोध पत्र के लिए निम्न शोध परिकल्पना का निर्माण किया गया है। बैकिंग सेवाओं के विस्तार में धीमी गति से परिवर्तन हुआ है।

 

 

 

 

 

 

विŸाीय समावेशन का राज्यवार सूचकांक

 

 

 

अध्ययन पद्धति:-

उक्त शोध पत्र में संख्यात्मक व गुणात्मक विश्लेषण ही प्रमुख उदे्श्य है। इसके लिए द्धितीयक संमको का संकलन किया गया है।  इसके अन्र्तगत जनर्लस, बुलेटिन, भारतीय सांख्यिकी विभाग, बैंको के आलेख व पांडुलिपियो का प्रयोग किया है।

 

उपरोक्त चित्र में उच्च स्तरीय विŸाीय समावेशन केरल, महाराष्ट्र व कर्नाटक राज्य में पाया गया है। अखिल भारतीय  वर्ग विŸाीय समावेशन के मध्यम स्तर में पाया जाता है।

 

Region wise and Population group wise New Bank branches opened during 2011-12

 

Table -1

Region

Rural

Semi-urban

Urban

Metro-politan

Total

Central

543

483

240

119

4385

Eastern

301

352

217

89

959

North eastern

43

60

49

-

152

Northern

450

425

187

205

1267

Southern

647

871

315

247

2080

Western

269

387

122

297

1075

Total

2253

2578

1130

957

6918

 

स्त्रोत:

Report on trends and Progress of Banking in India for the year ended June 30, 2012 RBI

 

ग्रामीण क्षेत्र मे नये बैकों की शाखाएं खोलने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किए गये प्रयासो के फलस्वरुप खोली गयी नयी शाखाओं का 2/3 से अधिक शाखाएं 2011-12 ग्रामीण अथवा उप-नगरीय क्षेत्र में खोली गयी है उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि नयी शाखाओं का 30 प्रतिशत दक्षिण क्षेत्र में खोला गया है उŸार - पूर्वी क्षेत्र में यह 2 प्रतिशत हिस्सा ही रहा है जो काफी कम हैै। उŸारी पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र मे 2011-12 मे अन्य क्षेत्रो की तुलना में यह प्रतिशत कम रहा है।

 

समस्यांए

ऽ  विŸाीय समावेशन में निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

ऽ  ग्रामीण क्षेत्रो मे शाखा विस्तार की कमी

ऽ  क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों की खस्ता हालत

ऽ  कम उत्पादकता व जोखिम

ऽ  ग्रामीण क्षेत्रो में साख जमा अनुपात में गिरावट

ऽ  छोटे व सीमान्त किसानो की कमजोर आर्थिक स्थिति

ऽ  अपर्याप्त जानकारी व कम विŸाीय बोध

ऽ  कम कौशल तथा ग्रामीण क्षेत्र के गैर - कृषि श्रमिको तथा शहरी श्रमिको के बीच कमजोर सबंध

ऽ  निम्न आय वर्ग के व्यक्तियों का यह मानना होता है कि बैंक केवल धनी व्यक्तियों के लिए होते है। आय का स्तर  भी विŸाीय सेवाओ मे प्रवेश को निर्धारित करता है।

ऽ  विभिन्न नियम व शर्तः- ऋण लेते समय या खाता खोलते समय बैंको की ओर से विभिन्न नियम व शर्त को लागू किया जाता है जिससे अशिक्षित व निर्धन वर्ग को कई कठिनाइयो का सामना करना पड़ता है।

ऽ  वैध पहचान पत्रो का अभावः-

ऽ  ग्रामीण वर्ग के पास वैध पहचान पत्र जैसे वोटर आई कार्ड ,पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, रोजगार पहचान पत्र, आदि का अभाव पाया जाता है।

ऽ  भौगोलिक समस्याः-

 

वाणिज्यिक बैंक केवल लाभप्रद क्षेत्र में ही काम करते है तथा अपनी षाखाएं भी व्यासायिक क्षेत्र मे खोलते है। इसलिए अविकसित क्षेत्रो में रहने वाले लोगो को बैकिंग सुविधा प्राप्त करने मे कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है इसलिए वे बैकं सेवाओ का प्रयोग नही करते

 

विŸाीय समावेशन की चुनौतियंा

वर्तमान समय मे विŸाीय बहिष्करण की समस्या अत्यन्त व्यापक तथा गंभीर है। इस सन्दर्भ मे विŸाीय समावेशनआवश्यक है। समाज में विŸाीय रुप से बहिष्कृत लोगो को, जिन्हे मंाग के बावजूद साख उपलब्ध नही कराया जाता। उन्ही उपेक्षित व निम्न आय वर्ग के असंरव्य लोगो को सस्ती लागत पर बैकिंग सुविधा मुहैया करायी जाए। विŸाीय समावेशन मे साख के साथ - साथ, औपचारिक विŸाीय सस्ंथाओ द्वारा प्रदान की जाने वाली कई अन्य विŸाीय सेवाओं को शामिल किया जाए जैसे बचत बीमा भुगतान सुविधाएं इत्यादि। विŸाीय बहिष्करण का एक कारण यह है कि पारम्परिक बैकिगं मानसिकता जिसके अन्र्तगत बडे खातो तथा बडे निगम के ग्राहको को प्राथमिकता दी जाती  है और समाज का एक बडा वर्ग बैकिगं सेवाओ का लाभ नही उठा पाता। बैंको द्वारा विŸाीय सहायता न देने का प्रमुख कारण यह है कि गरीब वर्ग असंगठित है। इसलिए इन्हें शामिल करना मुश्किल है इनके द्वारा प्रदान किए जानेवाला व्यवसाय का आकार बहुत कम है; छितरे - छितरे स्वरुप तथा छोटी - छोटी ऋण आवश्यकताओ के कारण इस क्षेत्र को ऋण देना लाभप्रद नहीं है; इस क्षेत्र का आर्थिक मुल्यवद्र्वन में भी योगदान कम है। जिससे ऋणों की अदायगी में कठिनाई होने की संभावना है। और अप्रयोज्य आस्तियां अधिक हो जाती है।

 

निष्कर्ष:

स्वतन्त्रता के बाद पहली बार 1991 से 2002 के बीच संस्थात्मक स्त्रोतो पर निर्भरता में कमी हुई है। 1991 में ग्रामीण ऋण में संस्थात्मक स्त्रोतो का हिस्सा 64 प्रतिशत था जो 2002 में कम होकर 57 प्रतिशत रह गया। केवल महाजनो का हिस्सा ही इस अवधि में 17.5 प्रतिशत से बढकर 29.6 प्रतिशत हो गया। इस प्रकार सभी ग्रामीण परिवारो के लगभग 48 प्रतिशत किसान परिवारों के लगभग 78 प्रतिशत की किसी प्रकार की बैकिंग सेवाओं तक पहँुच नही है।

 

हाल के वर्षो में संस्थात्मक साख में काफी विस्तार हुआ है। परन्तु कृषि को संस्थागत ऋण के इस विशाल प्रसार से कितनाविŸाीय समावेशन हो पाया है यह कह पाना कठिन है। यहाॅ हम यह कह सकते है कि विŸाीय रुप से मजबूत तथा प्रभावशाली सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों के ग्रामीण क्षेत्र में व्यापक, शाखा विस्तार के बिना, साख सुविधाओ का प्रसार संभव नहीं है। व्यापक स्तर पर फैली हुई तथा मजबूत संस्थात्मक संरचना वाली बैकिगं प्रणाली का होना आवश्यक है जिसका देश के सभी क्षेत्रो में व्यापक विस्तार हो।

 

स्व-सहायता संगठनो व लघु विŸा संस्थाए ;ैभ्ळ ंदक डथ्प्ष्ेद्ध निर्धन लोगो को सीधे वितीय सहायता पहॅुचाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान कर सकती है।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूचीः

-         www.rbi.org

-         S. Mahender dev ,”Financial Indusion : Issues and challenges” Economice political weekly, October 14,2006 p.4310

-         N.Srinivassam, “Policy Issues and Role of Banking system in Financial Indusion” Economic and Political weekly, July 28,2007,p.3091

-         www.rbidocs.org.in

मिश्र - पुरी, भारतीय अर्थव्यवस्था, हिमालया पब्लिशिंग हाउस मुम्बई

-         Report on trends and Progress of Banking in India for the year ended June 30, 2012 RBI

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-         

Received on 23.09.2013

Revised on 21.10.2013

Accepted on 05.11.2013     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(4): October-December,  2013, 581-583